September 3, 2019
मेरी बेटी बनेगी गांव की पहली फैशन डिज़ाइनर!
गोरखपुर से कुछ दूरी पर धर्माडीह गांव है। इस गांव की आबादी 150-200 लोगों के बीच है और मुख्य रूप से लोग दलित समुदाय से हैं। इस गांव में प्राथमिक शिक्षा से आगे की पढ़ाई करनी है तो 3-4 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है और उससे आगे के लिए सात-आठ...
Vineet
Tripathi
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गोरखपुर से कुछ दूरी पर धर्माडीह गांव है। इस गांव की आबादी 150-200 लोगों के बीच है और मुख्य रूप से लोग दलित समुदाय से हैं। इस गांव में प्राथमिक शिक्षा से आगे की पढ़ाई करनी है तो 3-4 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है और उससे आगे के लिए सात-आठ किलोमीटर दूर। किसी के लिए भी उच्च शिक्षा, एक सपना ही है और अगर वो लड़की हो तो यह और भी मुश्किल हो जाता है। मुख्य सड़क तक भी जाने के लिए निजी साधन के अलावा कोई सहारा नहीं है।
इतनी मुश्किलों के बावजूद, धर्माडीह गांव की संजना ने गांव की पहली फ़ैशन डिज़ाइनर बनने का सपना पाला हुआ है। इस सपने को सच करने लिए वो हर रोज़ लगभग तीस किलोमीटर का सफर करती हुई गोरखपुर जाती है।
जिस गांव में बमुश्किल से लोग हाईस्कूल तक की पढ़ाई करते हों वहां गांव से क़दम निकाल कर फ़ैशन डिज़ाइनिंग का कोर्स करने के लिए, हर रोज़ गोरखपुर जाना इतना आसान नहीं था। लेकिन इस सफ़र को आसान कराया संजना के माता-पिता ने, जिन्होंने अपनी बेटी के फ़ैसले का सम्मान करते हुए हर कदम पर उसका मज़बूती से साथ दिया।
संजना का साथ देना उसके माता पिता के लिए आसान नहीं था। कैसे होता जब हम एक ऐसे समाज में जीते हैं जहाँ लड़की के ज़्यादा पढ़ने, उसके कपड़ों और मोबाइल से उसका चरित्र तय किया जाता हो। जहाँ दहलीज के बाहर क़दम रखते ही पितृसत्ता के बनाए नियम उसे जकड़ने के लिए हमेशा तैयार बैठे रहते हैं। और सवाल हमेशा वही – कुछ ऐसा-वैसा हो गया तो कौन ज़िम्मेदार होगा?
“लड़की घर की इज़्ज़त होती है, इज़्ज़त को संभाल कर रखो!”
“हाईस्कूल तो कर लिया है, अब शादी करो!”
“पढ़ाई करके क्या करेगी जब शादी के बाद इसको बच्चे व घर ही संभालना है?”
ये सवाल संजना के माता-पिता को भी परेशान कर रहे थे। सामाजिक दवाब के चलते उन्होंने एक बार तो संजना से न ही कह दिया था।
संजना एक पियर एजुकेटर (सहकर्मी शिक्षक) ग्रुप की सदस्य है। यह समूह महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ब्रेकथ्रू द्वारा बनाया गया है। यह ग्रुप सुनिश्चित करता है कि गांव में शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक भेदभाव के मुद्दे पर बातचीत हो और एक समानता वाला समाज बन सके। संजना ने भी इस समूह में जब अपनी समस्या बताई तो सब उसके समर्थन में आगे आए।
समूह ने संजना के माता-पिता से बात की तो वो संजना की सुरक्षा को लेकर चिंतित दिखे। उनका कहना था कि मुख्य सड़क गांव से दूर है, वहां तक पैदल जाना, वो भी सूनसान से रास्ते पर, फिर आगे भी साधन मुश्किल से मिलते हैं, यह संजना कैसे करेगी? इस पर सब ने समझाया कि जहां मुश्किलें हैं वहीं रास्ते भी है। संजना हिम्मती है वो इसको हैंडल कर लेगी। जब संजना अपने पैरों पर खड़ी होगी तो वह उनकी भी मदद कर सकेगी। संजना गांव के अन्य लोगों के लिए प्रेरणा बन सकेगी। लोग उन्हें फैशन डिज़ाइनर संजना के पापा और मम्मी के रूप में जानेगें!
पियर एजुकेटर ग्रुप के सदस्यों की इन बातों के सुनकर संजना के माता-पिता की आंखों में चमक आ गई। उनको अपनी बेटी के लिए गर्व महसूस हुआ। वह उसकी पढ़ाई के लिए राज़ी हो गए। संजना की मुस्कराहट वापस आ गई थी। अब फ़ैशन डिज़ाइनर बनने का सपना सिर्फ उसका नहीं है, वो अब उसके माता-पिता का भी सपना है।
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