February 18, 2019

एक लड़की होने का गुरूर।

यूँ ही एक रोज़ सड़क के किनारे से गुज़रते वक़्त मेरी नज़र सड़क के किनारे खड़े लड़कों पर पड़ी। छोटी उम्र में, हाथ में सिगरेट, घूरती निगाहें और अपशब्द जो जहान को तार-तार करने के लिए काफी होते हैं। मैंने देखा की शायद वो नज़रे उम्र का ख्याल रखे बिना...

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Aditi

Mishra


यूँ ही एक रोज़ सड़क के किनारे से गुज़रते वक़्त मेरी नज़र सड़क के किनारे खड़े लड़कों पर पड़ी। छोटी उम्र में, हाथ में सिगरेट, घूरती निगाहें और अपशब्द जो जहान को तार-तार करने के लिए काफी होते हैं। मैंने देखा की शायद वो नज़रे उम्र का ख्याल रखे बिना सबको एक जैसी अशलील निगाहों से देख रहे थे ।

मेरी भी उस गली से निकलने की बारी आई। डरे-सहमे से मेरे कदम आगे बढ़े। मेरी नज़रे झुकी थी और हाथों में, मैंने अपने बैग को काफ़ी कस के जकड़ लिया। जब वो नज़र मुझ पर पड़ी, तो मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे शरीर पर किसी ने तेज़ाब डाल दिया हो। जब वो शब्द मेरे कानों में पड़े तो लगा जैसे जिस लड़की होने पर मुझे गुरूर था, वो टूट गया हो। आँसू थे मेरी आँखों में शर्मिंदगी के, बस यही लग रहा था कि जल्दी से घर आ जाए। माँ की गोद में सर रखकर रोना है मुझे।

घर आया, माँ सामने आई। माँ हाले दिल समझ गयी और पूछी भी, क्या हुआ? परेशान और घबराई हुई क्यूँ लग रही हो? बस एक हल्की सी मुस्कान देकर मैंने बोला, घर आकर तुमको देखना था देख लिया, अब सारी परेशानियाँ ख़त्म हो गयी। मैंने वो व्याख्या किसी को नहीं सुनाया और कई दिन तक वहाँ से जाना नहीं हुआ।

फिर एक बार बड़ी बहन के साथ उस रास्ते पर जाना हुआ। फिर वही लड़के, उनकी घटिया घूरती नज़र और उनके ना पाक इरादे। ये देखते हुए शायद दीदी बात समझ गयी कि मैं डर गयी हूँ। मैंने दीदी से कहा,यहाँ से नहीं कहीं और से चलते हैं। वो बोली अब मंज़िल दूर नहीं, यहीं से चलो। मेरा हाथ थामकर, मुझे उन नज़रों और अपशब्दों से बचाते, उनको कट्टर जवाब देकर, उनकी बोलती बंद करके वहाँ से ले आई।

उस दिन मैं बहुत खुश थी। हालाँकि घर पर हमने उस बारे में कोई बात नहीं की और ना ही कभी आपस में की। पर उस घटना ने मुझे हिम्मत दे दी। दूसरे दिन स्कूल से वापस आते वक़्त मैं उसी रास्ते से आई। वही लड़के, वही नज़रे पर अब फ़र्क इतना है कि मेरे कदम बिना डरे,आगे बढ़े। मेरी नज़रे झुकी नहीं थी और बैग मेरे कंधो पर था, हाथों में नहीं। आत्मविश्वास था, लग रहा था, पता नहीं कौन सी जंग जीत ली। मुझे आता देख वो लड़के वहाँ से चले गए, निची नज़रे किये व आत्म ग्लानि से भरे।

मुझे वो फिर ना कभी वहाँ पर दिखे और फिर ना कभी मैं उस रास्ते पर अकेले जाने में डरी। आज भी वो बातें सोच कर यही लगता कि वो भी लड़की है, मैं भी लड़की हुई। उसे हमेशा से गुरूर था,अपने लड़की होने का और उसने मेरा भी गुरूर नहीं टूटने दिया। उस दिन के बाद से पछतावा नहीं हुआ,अपने लड़की होने पर। बस यही कहना चाहती हूँ — आवाज़ उठाओ और तुम एक लड़की हो इसे शान से बताओ।

Note: 2018 में ब्रेकथ्रू ने हज़ारीबाग और लखनऊ में सोशल मीडिया स्किल्स पर वर्कशॉप्स आयोजित किये थे। इन वर्कशॉप्स में एक वर्कशॉप ब्लॉग लेखन पर केंद्रित था। यह ब्लॉग पोस्ट इस वर्कशॉप का परिणाम है।

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