January 15, 2018
‘डोली में जाना और अर्थी में आना’: एक औरत की ज़िम्मेदारी ?
कल की ही बात है, मेरे पड़ोस में रहने वाली रमा दीदी जो कि एक कम्पनी में डेटा एंट्री ऑप्रेटर के रूप में काम करती हैं, उनकी चीखने की आवाज़ आ रही थी। मैंने जानने की कोशिश की तो पता चला, आज ऑफिस से आने में थोड़ी लेट हो गई...
Farman
Ahmed
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कल की ही बात है, मेरे पड़ोस में रहने वाली रमा दीदी जो कि एक कम्पनी में डेटा एंट्री ऑप्रेटर के रूप में काम करती हैं, उनकी चीखने की आवाज़ आ रही थी। मैंने जानने की कोशिश की तो पता चला, आज ऑफिस से आने में थोड़ी लेट हो गई थीं इसलिए उनके पति ने उनको सात पुश्ते याद दिला दी थी। ये बात सिर्फ़ एक दिन की नही थी। मैंने पहले भी बहुत बार उस घर से दर्द की चीखें सुनी थी। कभी देर से आने के लिए तो कभी खाने में नमक कम रह जाने की वजह से, उनके पति अक्सर छोटी-छोटी बातों पर उनके साथ मार पीट करते थे।
मेरा घर उनके बिलकुल नज़दीक ही है तो अक्सर उनकी चीख मुझे अंदर अपने रूम तक सुनाई देती हैं। मैं बहुत बार उन्हें सुबह 5 बजे कपड़े छत पर डालते हुए और फिर रात में 10-11 बजे उन्हीं कपड़ो को उतारते हुए देखता हूँ। घर की सभी ज़िम्मेदारियाँ वो बख़ूबी निभा रही हैं। कई बार मैंने कोशिश की कि जाकर पुछू उनके पति से की आखिर तुम्हें ये सब करने का किसने अधिकार दिया है। जो औरत अपने सारे सपनों का गला घोट कर अपने घर को खुशहाल बनाने के लिए, बच्चों को काबिल बनाने के लिए घर के साथ-साथ बाहर के काम भी कर रही है, तुम क्यों उसके जीवन को नरक बनाने में लगे रहते हो? मगर हर बार मैं रुक गया, कभी ख़ुद ही, तो कभी घरवालों के रोकने से। नही जानता था, कि क्यों मैं खुद को रोक लेता हूँ?
कभी सोचता था कि बाद में जाकर उनसे बात करूँ पर फिर मन कहता था कि मैं कैसे उनसे बात करुंगा, कैसे मैं उनके पति को समझाऊंगा। मगर उनकी चीखें हमेशा मेरे कानों में गूंजती रहती थी। कल मैंने उनके पति को कहते हुए सुना की तुम नौकरी छोड़ दो, तुमसे घर के काम तो संभाले नही जाते हैं बाहर के क्या ख़ाक पूरे होते होंगे। पर इस बार ये सुन कर मैं खुद को रोक नही पाया और मैं परिवार की रूकावटो को लाँघ कर पहुँच गया उस दहलीज़ पर जहां से मुझे वो चीखे सुनाई देती थीं। मैनें डरते हुए ही सही पर शुरुआत की उनसे बात करने की जो महिला को अपनी संपत्ति समझ बैठे थे। उस वक़्त मेरी दस्तक ने वहाँ एक दम सन्नाटा तो पसेर ही दिया था और साथ ही उन चीखों को भी शांत कर दिया था जो मुझे खींच कर वहां ले गयी थी। उदासी और दर्द जैसे वहां चारों और बिखरा पड़ा था। उस घुटन को मैनें खुद महसूस किया जो उस घर में समाई हुई थी।
मेरी थोड़ी सी देर की वहाँ मौजूदगी ने रमा दी को बहुत राहत दी थी और उस राहत में वो अपने ज़ख्मों को छिपाने में लग गयी थीं क्योंकि उन्हें अब भी ये ही लग रहा था कि ये उनका पारिवारिक मामला है। उनका दर्द ज़रूर मदद की गुहार लगा रहा था पर वो ख़ामोशी से उस दर्द को छिपाने में लगी थी। मैं भी वहाँ, चला ज़रूर गया था, पर मेरी हिम्मत ने दम तोड़ दिया और कुछ देर रुक कर मैं वहाँ से वापस आ गया। मेरी इस दस्तक ने उस वक़्त तो रमा दी को बचा लिया पर क्या वो हमेशा के लिए सुरक्षित रह पाएंगी? क्या उन्हें उस घर में सम्मान मिल पाएगा, क्या वो कभी अपने सपनों में जान डाल पाएंगी, ये सवाल अब भी मुझे परेशान कर रहे हैं।
ये कहानी एक रमा की नही है। ऐसी बहुत रमा हम अपने आस पास देख सकते हैं। हम देख सकते हैं कि वो किस तरह सुबह उठ कर पहले घर का काम करती है फिर बाहर की ज़िम्मेदारियों में पुरुषो के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलती हैं। 8 से 10 घंटे काम करके वापस वह अकेली फिर उन्ही ज़िम्मेदारियों में लग जाती है जिनसे वो निकल कर गयी थीं।
रुढ़िवादी विचारधाराओं ने आज भी हमारे समाज में महिलाओं का दायरा घर तक ही सीमित कर रखा है। इस सोच का दुष्प्रभाव सबसे ज़्यादा महिलाओं पर देखा जा सकता है। वो बाहर काम करने तो जा सकती है मगर पहले उसे घर की सभी ज़िम्मेदारियाँ संभालनी होंगी, क्योंकि खाना बनाना, बच्चें पालना घर के काम करना सिर्फ़ महिलाओं के कार्यक्षेत्र समझे जाते हैं। आज भी लाखों रमा घुट घुट कर चुपचाप इस हिंसा को सह रही हैं और अपने परिवार के लिए घर और बाहर दोनों की ज़िम्मेदारी निभा रही हैं। हमारा समाज ऐसी महिलाओं को सुशील व् समझदार महिला बताता है।
एक कहावत है, “डोली में जाना और अर्थी में आना”। चाहे तुम्हारे शरीर को कितनी ही मार खानी पड़े, चाहे तुम्हारे मन को कितने ही ताने सहने पड़े, चाहे तुम्हारी आत्मा को पल पल घुट घुट कर मरना पड़े, लेकिन अर्थी में ही आना, क्योंकि घर की शांति और सुख बनाएं रखना तुम्हारी ज़िम्मेदारी है।
आज जब समाज बदल रहा है, लोग जागरूक होकर अपनी बेटी को भी पढ़ा रहे हैं, ऐसे वक़्त में पुरुषों को अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए घर से बाहर तक, अपनी हिस्सेदारी निभाने की ज़रूरत है। दोनों मिल कर जब घर और बाहर की ज़िम्मेदारियों को समझते हुए एक दुसरे का साथ देगें तभी एक खुशहाल परिवार का निर्माण हो सकता है। एक महिला अगर अपने परिवार की ज़रूरत समझते हुए घर के साथ-साथ बाहर काम भी कर रही है तो पुरुष बाहर के साथ घर के काम में सहयोग क्यों नही कर सकता? हमे रुढ़िवादी विचारधाराओं को तोड़ते हुए आगे बढ़ना होगा और अपने परिवार के साथ पुरे समाज को खुशहाल बनाने में अपना योगदान देना होगा, तभी हम बेहतर कल की उम्मीद कर सकते हैं। याद रहे छोटी- छोटी कोशिशे ला सकती है एक बड़ा बदलाव।
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