December 15, 2020

उफ़ ये मर्दानगी के पैमाने!

पितृसत्तात्मक सोच से जन्मी मर्दानगी के कई पैमाने होते हैं। ये पैमाने हमें परिवार और समाज द्वारा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सिखाये जाते हैं। ये वो पैमाने हैं जिस पर पुरुषों को खड़ा उतरना पड़ता हैं। ज़िंदगी के प्रत्येक पड़ाव में मर्दानगी के मानकों तक पहुँचना पुरुषों के लिए...

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Roki

Kumar


पितृसत्तात्मक सोच से जन्मी मर्दानगी के कई पैमाने होते हैं। ये पैमाने हमें परिवार और समाज द्वारा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सिखाये जाते हैं। ये वो पैमाने हैं जिस पर पुरुषों को खड़ा उतरना पड़ता हैं। ज़िंदगी के प्रत्येक पड़ाव में मर्दानगी के मानकों तक पहुँचना पुरुषों के लिए अनिवार्य माना जाता है। जो पुरुष इन मानकों को पार कर जाते है उन्हें ही सच्चा मर्द कहा जाता है। जो इस दौड़ में पीछे रह जाते है उन्हें नामर्द बोलकर एक तरह से  दण्डित किया जाता है।

बचपन से ही मर्दानगी के मानकों को प्राप्त करने की भागदौड़ शुरू हो जाती हैं। मर्दानगी की इस दौड़ में जिस पुरुष ने इन मानकों को छू लिया उन्हें असली मर्द होने का टिकट मिल जाता हैं। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नही है कि जिन्हें मर्दानगी का टिकट मिल गया है वो अब इस दौड़ में नही दौड़ेंगे। ज़िंदगी के हर पड़ाव पर अपनी मर्दानगी को स्थापित और बरकरार करने के लिए उन्हें हर बार इस दौड़ में  दौड़ कर जितना ही पड़ेगा।

मर्दानगी के पैमानों में कुछ पैमानों को हम पूरी दुनिया में एक जैसा पाते हैं जैसे गुस्सा, हिंसा, लंबा चौड़ा कद आदि। कुछ पैमाने सामाजिक व भौगोलिक अंतर के अनुसार बदलते रहते हैं जैसे किसी क्षेत्र में पुरुषों का कान बिंदवाना मर्दानगी का एक पैमाना हो सकता है लेकिन किसी दूसरे क्षेत्र में ऐसा नहीं भी हो सकता है। सामाजिक रूप से हर पुरुष मर्दानगी के इन पैमानों को पाने के लिए लगातार कौशिश करता रहता है। फिर चाहे पुरुष इन पैमानों को सही मानता है या गलत। इस लेख के माध्यम से हम मर्दानगी के ऐसे ही कुछ पैमानों पर अपनी समझ बनाना की कौशिश करेंगे:

  • भावनाओं को व्यक्त करने  में कंजूसी।

अक्सर हमने देखा है कि पुरुष अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में बड़ी कंजूसी करते हैं। सबके सामने रोना, अपनी कमज़ोरियों के बारे में बात करना, करूणा और दया जैसे भावों को हमेशा छिपाकर रखना चाहते हैं। जो पुरूष सबके सामने रो देता है या फिर अपनी कमियों के बारे में बात करता है, उसे समाजिक रूप से कम पुरुष या नामर्द माना जाता है। एक सच्चे मर्द के लिए रोना वर्जित माना जाता है। अगर हम अपने बचपन के अनुभवों को भी देखें तो कितनी बार लड़कों को यह सुनने को मिलता है कि “क्यों लड़कियों की तरह रो रहे हो”, “लड़के रोते नही है”। इस तरह से एक पुरुष को मर्द बनाने की प्रकिया में पुरुषों की भावनाओं की अभिव्यक्ति खत्म हो जाती है।

  •  रूखा और सख्त व्यवहार का झूठा बखान।

एक तरह समाजीकरण के चलते पुरुषों में प्यार, दया, करुणा और संवेदनशीलता जैसे भावों को खत्म कर दिया जाता है। उनसे ये सामाजिक अपेक्षा रहती है कि मर्द रूखा और सख़्त व्यवहार का प्रदर्शन करें। पुरूषों का रूखा और सख्त व्यवहार सामाजिक रूप से उन्हें रौबदार मर्द के रूप में प्रस्तुत करता है। हम सभी ने अपने परिवार, आस पड़ोस या फिर स्कूल में ऐसे व्यवहार करने वाले पुरुष को ज़रूर देखा होगा जिस तक किसी भी काम के लिए बात करना बहुत मुश्किल सा लगता हो। विचारणीय बात यह है कि जब इस तरह के रौबीले और सख्त व्यवहार के पुरुष जब किसी कारण भावनात्मक रूप से टूट जाते हैं तो उनके लिए सबके सामने भावनात्मक अभिव्यक्ति बहुत मुश्किल हो जाती है। ऐसे पुरुष सिर्फ मर्दानगी साबित करने के चक्कर में अपनी भावनाओं और मर्दानगी के पैमानों के बीच घुटते रहते हैं। पुरुष अपनी भावनाओं को गुस्से और हिंसा के पर्दे के पीछे छिपा देते हैं।

  • पुरुष के लिए हिंसा ही एक मात्र विकल्प क्यों?

बचपन से ही पुरुषों को हिंसा का पाठ पढ़ाया जाता है। जब एक बच्चा अपने पिता के द्वारा घर मे हिंसा को देखकर बड़ा होता है तो उसके ज़हन में यह बात बैठ जाती है कि हिंसा को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने से ही मर्दानगी का ताज मिल सकता है। यही तस्वीर स्कूल में लड़के हिंसात्मक बुल्लिंग के माध्यम से सिखते हैं। इसलिए अगर हम लड़को द्वारा खेले जाने वाले खेलों में देखे तो ज़्यादातर का आधार ही हिंसा पर टिका है। पुरूषों द्वारा की जाने वाली हिंसा का सबसे बुरा प्रभाव महिलाओं और बच्चों पर पड़ रहा है। इसका मतलब यह नही है कि पुरुषों पर इसका बुरा प्रभाव नही पड़ रहा है। अक्सर यह देखने मे आता है कि की स्कूल -कॉलेज, नुक्कड़ पर छोटी सी बात पर एक पुरुष दूसरे पुरुष की हत्या तक कर देता है।

  • प्रभुत्व जमाने की अटूट कोशिशें।

घर से लेकर काम तक हर जगह हम पुरुषों को प्रभुत्व जमाते हुए देखते हैं। चाहे फिर बात राजनीति की हो या फिर सामाजिक मुद्दे, हर जगह पुरुष अपने आप को सर्वश्रेष्ठ दिखाने में लगा रहता है। अपने आप को सर्वश्रेष्ठ दिखा कर प्रभुत्व जमाना भी मर्दानगी का एक पैमाना है। इस पैमाने की वजह से अक्सर हम पुरुषों के बीच में  झगड़ा होते हुए देखते हैं। घरों और ऑफिस में भी हम देखते हैं कि महिलाओं की राय या बात  को पुरुषों द्वारा या तो काट दिया जाता है या पुरुष महिलाओं को चुप कराकर खुद समझाने लगते हैं। अपने बोलने के तरीके से ऐसे पुरुष ऐसा माहौल बना देते हैं कि कोई भी उनके सामने अपनी बात व्यक्त नही कर पाता।

  • यौनिकता का  ताकत के रूप में इस्तेमाल।

मर्दानगी के पैमानों में एक महत्वपूर्ण पैमाना विषमलैंगिकता भी है जिसका मतलब है विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण का होना। मर्दानगी के पैमाने समलैंगिकता को एक अपराध की तरह ही देखते हैं। उनकी नज़र में एक सच्चे मर्द को सिर्फ विषमलैंगिक ही होना चाहिए। इसलिए समलैंगिकता को समझने वालों के साथ हिंसा लोगो को तर्कसंगत लगती है जोकि बिल्कुल गलत है। इसके अलावा पुरुषों द्वारा यौनिकता को ताकत रूप में देखा जाता रहा है। इसलिए आपसी झगड़ों से लेकर बड़े बड़े दंगों में पुरुष लड़कियों और महिलाओं का बलात्कार करके अपनी शक्ति की नुमाइश करते हैं। पुरूषों का यौनिकता को लेकर नज़रिया उन्हें कभी असहमति को स्वीकार नही करने देता ।

मर्दानगी के ऐसे ओर भी पैमाने हैं जिन्हें पाने के लिए पुरुष किसी भी हद तक चले जाते हैं। लेकिन क्या होगा अगर ये पैमाने ही ना हो? जब किसी पुरुष के रोने पर उन्हें कोई मर्दानगी के पैमाने याद ना दिलाये जाएं। जब पुरुष किसी से मदद मांगने को कमज़ोरी से ना जोड़कर खुले मन से मदद को स्वीकार करें। जब पुरुषों के गुस्से औऱ हिंसा की जगह उनके करुणा और संवेदनशील होने को प्रोत्साहित किया जाए। जब पुरुषों को रिजेक्शन का कोई डर नही रहेगा और वो दूसरों की सहमति और असहमति का सम्मान करेंगे। वो दिन बहुत सुंदर होगा जब पुरुषों को मर्दानगी के झूठे पैमानों की ज़रुरत ही नही पड़ेगी और वो भी दुसरों की गरिमा को समझते हुए मानवता की बात करेंगे।

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