February 14, 2020
नफ़रत से नही, प्यार से डरता है समाज।
सिनेमा से लेकर किताबों तक प्यार की कहानियों और किस्सों ने लोगो के मन को बहुत छुआ है। बचपन से ही प्रेमी जोड़ों के किस्सों ने मानो दिल मे प्यार का बीज सा बो दिया हो। चाहे वो हीर रांझा हो या फिर लैला मजनू, इन किस्सों को सुनकर लोगो...
Roki
Kumar
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सिनेमा से लेकर किताबों तक प्यार की कहानियों और किस्सों ने लोगो के मन को बहुत छुआ है। बचपन से ही प्रेमी जोड़ों के किस्सों ने मानो दिल मे प्यार का बीज सा बो दिया हो। चाहे वो हीर रांझा हो या फिर लैला मजनू, इन किस्सों को सुनकर लोगो ने प्यार करना सीखा है। बहुत बार मैंने लोगो को इन किस्सों और कहानियों को सुनकर रोते हुए भी देखा है। यहीं नही इन कहानियों और किस्सों में जब प्रेमी जोड़े बिछड़ते हैं या फिर एक दूसरे के लिए जान भी दे देते हैं, लोगों के आंसुओं में उनके ना बिछड़ने की एक फरियाद भी नज़र आती है। लोग लैला मजनू, हीर रांझा के प्यार का सुखद अंत देखना चाहते हैं। लेकिन वास्तविकता में उनकी भावना बिल्कुल अलग नज़र आती है। असल ज़िंदगी में लोगों को प्यार मोहब्बत से बहुत समस्या है, मानो प्यार मोहब्बत उनका सबसे बड़ा दुश्मन हो।
कभी इज़्ज़त के नाम पर तो कभी जाति-धर्म के नाम पर, प्रेमियों की हत्या होना तो आम सी बात बन गयी है। देश में ऐसी अनेक घटनाएँ सामने आई हैं जो यह दर्शाती है कि सिर्फ कहानियों में नही बल्कि वास्तविक जीवन मे भी इज़्ज़त के नाम पर प्रेमी जोड़ों को मार दिया जाता है। चाहे 2007 में हरियाणा के मनोज बबली की हत्या हो या फिर 2016 में तमिलनाडु में कौशल्या के जीवन साथी शंकर की दिन दिहाड़े बर्बता से हत्या की घटना हो।
समाज का प्यार से परहेज का सिर्फ एक कारण नही है, ऐसे अनेक कारण हैं जो ऑनर किलिंग जैसी आग को सुलगाते रहते हैं। सबसे बड़ी बात तो समाज के लिए यही है कि एक लड़की कैसे अपने लिए फैसला ले सकती है। जब भी कोई लड़की अपने लिए खुद फैसले लेने लग जाती है तो सबसे बड़ा खतरा पितृसत्ता को होता है। पितृसत्ता कि जड़े तभी खोखली होने लगती हैं जब लड़कियाँ और महिलाएं अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने लगती हैं। पितृसत्ता की जड़ों को मज़बूत रखने के लिए ही समाज, परिवार पर ऑनर किलिंग करने का दबाव लगातार बनाता रहता है।
इसके अलावा सामाजिक तौर से लड़कियों और महिलाओं को ही इज़्ज़त से जोड़ कर देखा जाता है। समाज और परिवार की इज़्ज़त की गठरी का बोझ लड़कियों और महिलाओं को ही ढोना पड़ता है। इस इज़्ज़त को बरकरार रखने के लिए समाज द्वारा परिभाषित अच्छी लड़की या अच्छी औरत के दायरों में लड़कियों और महिलाओं को तमाम उम्र रहना पड़ता है। जब जब कोई महिला इन दायरों से बाहर जाकर प्यार जैसे अहसास को महसूस करना चाहती है, समाज उसे बुरी या गलत औरत की संज्ञा देने लगता है।
प्यार करने की मंज़ूरी तो हमारा समाज पहले से ही नही देता। अगर उस पर प्यार किसी अन्य जाति या धर्म में हो जाए तो मानो की समाज पर बहुत बड़ा संकट ही आ जाता है। 2016 में तमिलनाडु में कौशल्या के जीवन साथी शंकर दलित थे जो कि कौशल्या के पिता को बिल्कुल भी बर्दाश्त नही हुआ और शंकर को अपनी जान गवानी पड़ी। जाति, धर्म और वर्ग सामाजिक रूप से यह तय करते हैं कि हम किस से प्यार या शादी कर सकते हैं और किस से नही।
अभी तक तो हम सिर्फ प्यार के रास्ते में जाति, धर्म और वर्ग को ही देख पा रहे हैं । समलैंगिक रिश्तों में तो समाज की नफ़रतें ओर भी ज़्यादा गहरी हैं। समलैंगिक व्यक्तियों में प्यार का होना तो अभी समाज के लिए एक कल्पना जैसा है। नफरतों और हिंसा के लिए समाज के पास बहुत बड़ा दिल है इसलिए तंग गलियों से लेकर हाइवे तक नफ़रतें और हिंसा खुले तौर पर नज़र आती हैं। लेकिन प्यार के लिए मेरे समाज के लोगो के दिल और सोच बहुत सीमित हैं।
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