December 13, 2018
‘औरत सिर्फ कलेश करती है’: सत्य वचन या पितृसत्ता का कथन?
अपने परिवार में इकलौती लड़की होने के कारण बचपन में, मैं घर से बाहर हमेशा एक महिला, दीदी या सहेली की संगत के लिए मनोरथ रहती थी। मेरा स्कूल सेक्सिस्ट एवं पितृसत्तात्मक था जहाँ के शिक्षक भी यह कहने से नहीं कतराते थे की 'औरत नरक का द्वार है', 'औरत...
Shubhika
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अपने परिवार में इकलौती लड़की होने के कारण बचपन में, मैं घर से बाहर हमेशा एक महिला, दीदी या सहेली की संगत के लिए मनोरथ रहती थी। मेरा स्कूल सेक्सिस्ट एवं पितृसत्तात्मक था जहाँ के शिक्षक भी यह कहने से नहीं कतराते थे की ‘औरत नरक का द्वार है‘, ‘औरत सिर्फ कलेश करती है‘, ‘एक औरत किसी दूसरी औरत का भला कभी नहीं सोच सकती‘। मैं भी इसी पितृसत्तात्मक सोच के साथ बड़ी हुई जहाँ लड़कियों को छोड़ कर सिर्फ लड़कों को मित्र बनाया जाता था ताकि ज़िन्दगी में ‘कलेश‘ कम हो।
मुझे आज भी याद है मेरा वह इम्तिहान लेने वाला वक़्त जब मेरी स्कूल लाइफ ख़तम हुई थी। एक के बाद एक, कुछ कारणवश मुझ पर दुखों के पहाड़ टूटते रहे। उस वक़्त मेरा साथ देने वाला, मुझे हौंसला देने वाला कोई और नहीं मेरी एक महिला मित्र थी। मेरी सहेली, अक्षिता, बचपन से ही मेरे पड़ोस में रहती थी पर बचपन में हम मित्र नहीं थे। इसका कारण था मेरा स्कूल जो मुझे सिखाता था कि यदि कोई लड़की बुद्धिमान और ख़ूबसूरत है तो आप उनसे दोस्ती नहीं सिर्फ ईर्ष्या कर सकते हैं। बहरहाल, जीवन में जब चुनौतियाँ आयी तब यह सीख भी आयी कि जो साथ और दोस्ती एक महिला, महिला के साथ निभाती है वह और कोई नहीं निभा सकता।
अक्षिता ने मुझे एक बेहतर इंसान बनाया। उन्होंने मुझे पढ़ाई, राजनीति, नारीवाद से ले कर ज़िंदगी के भी पाठ पढ़ाये। मेरे फेमिनिस्ट और राजनैतिक रूप से जागरूक होने के पीछे भी मेरी सहेली अक्षिता का हाथ है। मैं अपनी ज़िंदगी के ऐसे मोड़ पर थी जब मैं पूरा दिन बिस्तर पर पड़े रह कर रोना या सोना चाहती थी। अक्षिता ने मुझे यह सिखाया कि ज़िंदगी को अभी भी एक बहुत सुन्दर मोड़ दिया जा सकता है। वह अक्षिता ही थी जिनसे प्रेरणा लेकर मैंने फिल्म–स्टडीज़ में मास्टर्स किया और फिर विकास क्षेत्र में नौकरी ली।
सही मायने में अक्षिता ने मेरे जीवन को नया रंग दिया और खुद से प्यार करना सिखाया। जब भी कोई मुझसे दो सहेलियों कि मित्रता का व्याख्या करता है तो मेरे मन में सबसे पहले अक्षिता कि तस्वीर ही आती है।
अक्षिता और मैं रोज़–रोज़ नहीं मिलते, कभी कभी तो साल भी गुज़र जाते हैं। पर जब भी मिलते हैं तो अपने जीवन के हर दुःख–सुख को साझा करते हैं और एक दुसरे को जज या आलोचना किये बिना सुनते हैं। न मिल पाने पर, जन्मदिन भूल जाने पर या मैसेज का जल्दी रिप्लाई न कर पाने पर हम में कभी झगड़ा नहीं होता क्योंकि हम दोनों एक दुसरे को भली भाँती समझते हैं। हम दोनों यह जानते हैं कि हम एक दुसरे से बिना किसी शर्त या द्वेष के प्यार करते हैं।
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